May 9, 2021
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‘खून बिन जाने न देंगे जिंदगी’- डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी

खून की बूंद अगर गर्म है तो जिंदगी है, वरना दुनिया से रुखसत होने में देर नहीं लगती। समान्य जिंदगी जीने वाले समाज से भिन्न एक समाज होता है जिसे खून की कीमत का पता होता है, अगर हम इस पर विचार करें तो सामने आता है कि खून प्राप्त करने वाले से ज्यादा अहमियत खून दान करने वाले की होती है। भले ही रक्तदाता एक सामान्य भावना के साथ खून दान करता है परंतु यह दान कोई आम दान नहीं। खून की कीमत वही जानता है जिसको किसी की दान की हुई चंद बूंदों से जिंदगी मिल गयी। खून दान करना वाकई एक महान कार्य है पर इस से भी महान है लोगों में खून दान करने का जज्बा पैदा करना। 14 जून, रक्तदाता दिवस पर आवश्यक हो जाता है उस महान व्यक्तित्व का उल्लेख करना, जिनकी पावन प्रेरणाओं से प्रेरित होकर कितने लोगों में आज खूनदान करने का जज्बा है, उनकी एक आवाज पर हजारों की तादाद में लोग ब्लॅड बैंक के सामने लाईनों में आ खड़े होते हैं। ये लोग न किसी का धर्म मजहब पूछते हैं, ना किसी की जात देखते हैं। इनका एकमात्र मकसद होता है दूसरे के जीवन को बचाना। 

लोगों में ऐसी प्रेरणा भरने वाले पूज्य गुरु संत डाॅ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को हम बार बार प्रणाम करते हैं। संत जी ने हमेशा परोपकार करने की बात कही है। गुरुजी ने जीते-जी गुर्दादान, रक्तदान और मरणोपरांत नेत्रदान व शरीरदान की अनुठी रीत चलाकर डेरा सच्चा सौदा की देश-विदेश में बैठी करोड़ों की संख्यां में साध-संगत को जीवन जीने का नया ढंग सिखाया है।

पूज्य गुरु संत डाॅ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां फरमाते हैं कि “रक्तदान करके अगर किसी की जान बचाई जा सकती है तो यह बहुत पुण्य का कार्य है। मानवता के नाते इन्सान को रक्तदान करना चाहिए। रक्तदान करने से शरीर में कोई कमजोरी नहीं आती, बल्कि पहले की तुलना में अच्छा रक्त बनता है और शरीर में ताजगी महसूस होती है।”

डेरा सच्चा सौदा की साध-संगत के रक्तदान के प्रति जज्बे को देखते हुए पुज्य गुरुजी ने उन्हें ट्रयू ब्लॅड पंप की संज्ञा दी है, यानीकि उन्हे चलता-फिरता ब्लॅड पंप कहा जा सकता है।

कितने युनिट खूनदान कर चुकें डेरे के अनुयायी?

इन सेवादारों ने रक्तदान को आदर्श मानते हुए प्रण लिया है कि ‘खून बिन जाने न देंगे जिंदगी’ अपने इसी प्रण पर चलते हुए यहां के अनुयायी मई-2020 तक 5 लाख 32 हजार युनिट से भी ज्यादा रक्त इन्सानियत के लिए दान कर चुके हैं।

कोरोना वायरस व लॉकडाउन के दौरान क्या रहा रुझान

कोरोना महाकाल में लाॅकडाउन के दौरान डेरा प्रेमियों ने 14 जून को International Blood Donor Day के उपलक्ष्य में भारत भर में रक्तदान शिविरों का बड़े स्तर पर आयोजन किया। ऐसे दौर में लोगों के लिए घरों से बाहर निकलना मुनासिब नहीं था, लेकिन डेरा प्रेमियों ने मौत के डर को मात देते हुए ब्लॅड बैंकों में जाकर रक्तदान किया और एक ही दिन में हजारों युनिट रक्तदान किया गया। लॉकडाउन में थैलेसीमिया पीड़ितों के लिए डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी फरिश्ता बनकर सामने आए। इस नेक कार्य की समाज के समझदार और बुद्धिमान लोंगों ने खूब प्रशंसा की। मानवता के लिए हमेशा तत्पर रहने वाले इन रक्तदान योद्धाओं को हम तहेदिल से सलाम करते हैं।

लाॅकडाउन के चलते देश में ब्लॅड बैंकों की मांग पर 7980 युनिट रक्तदान

थैलेसीमिया पीड़ीत बच्चों के लिए डेरा सच्चा सौदा के श्रद्धालुओं के द्वारा देशभर में जैसे हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली पंजाब, चंडीगढ़, राजस्थान और उतराखंड सहित अन्य राज्यों में रक्तदान किया है। कोरोना महामारी में रक्तदान के दौरान खून दान करने वाले रक्त वीरों के द्वारा सुरक्षा मानकों का पूर्ण पालन किया गया, वहां रक्तदानी मास्क पहनने के साथ-साथ सेनेटाइजर भी लेकर आए और एक निश्चित दूरी पर रहते हुए रक्त दान किया।

क्या क्या रहे रक्तदान करने के मापदंड

रक्तदान की बात करें तो देशभर में इस पुण्य के कार्य के लिए डेरा श्रद्धालुओं की हर तरफ खूब प्रशंसा की गयी। बुद्धिजीवी लोगों ने माना कि वास्तव में मानवता भलाई के कार्यों में डेरा सच्चा सौदा के सेवादारों का कोई सानी नहीं। अपने गुरु संत डाॅ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की पावन शिक्षाओं पर चलते हुए थैलेसीमिया से पीड़ित छोटे बच्चों के लिए रक्तदान करने हेतू घरों से निकल कर ब्लॅड बैंक जा पँहूचे।

रक्तदान करने में पंजाब ने 2619 युनिट और हरियाणा ने 2402 युनिट का आंकड़ा पार किया। इसके अलावा दिल्ली में 1479 युनिट, राजस्थान में 670, उत्तर प्रदेश में 590, उत्तराखंड में 140 और चंडीगढ़ में 80 युनिट रक्तदान किया गया। एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि रक्तदान के क्षेत्र में डेरा सच्चा सौदा के नाम 5 विश्व रिकार्ड दर्ज हैं, जिनमें से 3 गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड, 1 लिम्का बुक रिकार्ड और 1 एशिया बुक रिकार्ड हैं।

अंत में यही निष्कर्ष निकलता है कि हर तंदुरुस्त व्यक्ति 3 महीने के अंतराल के बाद आराम से रक्तदान करके किसी भी जरूरतमंद मरीज को जीवनदान दे सकता है और पुण्य का भागीदार बन सकता है। इसके लिए हम रक्तदान को अपने जीवन की एक अहम जिम्मेदारी समझ कर खुद को स्वस्थ रखने और दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए रक्तदान जरूर करना चाहिए  और रक्तदान महादान, रक्तदान जीवनदान के उद्घोष को चरितार्थ करना चाहिए।